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मैं सरस्वती हूं, मेरे किनारे वेदों की रचना, धर्म युद्ध एवं भारतीय सभ्यता के उद्गम की मुख्य धाराओं का मिलन हुआ। मनुष्य के विकास की कड़ियां सहेजने की भी खुशकिस्मती मुझे प्राचीनतम हड़प्पा घाटी सभ्यता जिसकी मैं साक्षी हूं से हजारों वर्ष पूर्व से है। मेरे आंचल में पशुपालन से लेकर खेती-बाड़ी/उद्योग तक के विकास की एक अखंड यात्रा समेटी पड़ी है।मौजूदा समय मुझे घग्गर, मारकंडे, अलोप हो चुकी सरस्वती नाम से भी आप जानते हो; मुझे ज्ञान की देवी; ललित कलाओं की सर्जन करता भी मानते हो। आधुनिक गुजरात के समंदर में अलोपित होने से मेरे उद्गम स्थान तक मेरी असंख्या संतानों ने ज्ञान के प्रकाश से इस भारतवर्ष को रोशन किया है। सनातन विचारधारा के आप ही सृजक व वंशज हो। भगवान राम, भगवान कृष्ण की लीलाएं उनके धर्म युद्ध और उनके माध्यम से मानव सभ्यता को उपदेश, शिक्षा की चिंगारी मेरे इर्द-गिर्द ही प्रज्वलित हुई जिससे आपकी शोभा विश्व विख्यात हुई। दूसरी सभ्यताओं व देशों के लोग मेरे भारत में ज्ञान की लौ हासिल करने के लिए तक्षशिला जैसे महाविद्यालय में अध्ययनरत थे।

राजपाट व शक्ति की लालसा में हमलावरों को रोकने में मेरी ही संतानों पोरस, पंजाब के योद्धाओं, निडर बहादुर सिखों ने, महाराजा रणजीत सिंह  ने समय समय हमलावरों से मेरे इर्द-गिर्द व पानीपत के मैदान में, मेरी सखी बहनों पांच नदियों के बीचोबीच रण में भारत की रक्षा भी की है। अंग्रेजों से भारत की आजादी के समय मेरे और मेरी सखी नदियों के इर्द-गिर्द के मेरे पुत्रों लाजपत राय,भगत सिंह, सर छोटू राम व अनेकों संतानों ने कुर्बानियां दी हैं। कुर्बानियां दे हासिल की गई आजादी की आड़ में राजनीतिक कारणों से आम जनता के दुख हरण होने के बजाय बढ़ते गए, यह बात अलग है के तरक्की के  अवसर भी बढ़े  पर गरीबी दूर नहीं हुई, विषमता निरंतर बनी रही। राजनेताओं का आडंबर, उनके द्वारा जनता को छलने की नीतियों में बढ़ावा होता ही गया। आजाद भारत में मेरी संताने आज हनुमानगढ़, गंगानगर जिलों में धरती को उपजाऊ और गुलजार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं परंतु विकास की गति में यह दोनों जिले पीछे रहते जा रहे हैं जब के आप अपने अथक मेहनत से यहां पर सोना उपजा रहे हैं। राजनीति की विकृतियों ने यहां स्थाई नेतृत्व उभरने नहीं दिया है; इस तरह के माहौल में मेरे कुछ योग्य पुत्र पुत्रियां आगे आते रहे हैं।अतीत में मेरे बहाव क्षेत्र में ऋषि कपिल, जंभाजी, चौधरी कुंभाराम आर्य, देवी लाल चैटाला, स्वामी केशवानंद भारती, हेतराम बेनीवाल, रानिया के राम सिंह नामधारी ने इस क्षेत्र में सेवा, शिक्षा, ज्ञान, कुर्बानी व विकास का परचम लहराया। पर मेरी श्रमजीवी संतानों का पिछड़ापन, गरीबी निरंतर बने रहे।

इसी दौरान मेरे संगरिया में पैदा हुई सरस्वती की पुजारिन डॉक्टर परम भी जयपुर में चिकित्सा सेवा में एक उच्च मुकाम पर पहुंची और वहां से मेरे आंचल में आकर सेवा भावना से संगरिया टिब्बी में अपने आपको न्योछावर करने में जुट गई। उसकी मेहनत की गाढ़ी कमाई का सदका संगरिया टिब्बी में विकास की गंगा बह चली। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव लड़ करके उसने कामयाबी हासिल कर यहां हजारों करोड़ के जीवन में बदलाव करने के सेवा के स्तंभ स्थापित किए। द्वेश, ईर्ष्या की भावना से उसको संकीर्ण राजनीति ने चुनाव की व्यवस्था से बाहर रखने का धोखा किया। फिर भी उसने निस्वार्थ सेवा के माध्यम से आप से जुड़ाव बनाए रखा। चिकित्सा में अत्यंत उन्नत ज्ञान के साथ जयपुर में अपना सिक्का जमाने के बाद वह सभी सुविधाओं का त्याग कर आपके बीच सेवालीन है और आप सब की अच्छाई, भलाई के लिए, इलाके के विकास के लिए, अपने इस संगरिया टिब्बी में प्रेम शांति एवं सुख समृद्धि का व्यापक वातावरण आपके लिए बनाए रखने के वास्ते डॉ परम ने आगामी चुनाव लड़ने का बीड़ा फिर उठाया है। मैं जानती हूं कि मेरी संतानों में बहुत से काबिल लोग हैं मगर काबिल होने के साथ-साथ त्याग, बलिदान, सेवा भावना से कटिबद्ध व ज्ञानयुक्त निस्वार्थ इमानदारी की जो लौ डॉ परम में है वह विरलों में ही मिलेगी।भविष्य में मेरी इस बच्ची को मेरा आशीर्वाद!! क्योंकि उसने सरस्वती की पुजारिन होने का जो सबूत दे, सेवा की मूर्ति होने का विश्वास स्थापित किया है उसको मेरा परम आशीर्वाद है। मेरे इलाके की समृद्धि के लिए वह एक महत्वपूर्ण संतान है जिसमें सोच, समझदारी मेहनत, सेवा भावना, इस मिट्टी की कदर, आपकी वोट की महिमा, आपकी वोट का महत्व व अपने संगरिया/टिब्बी का सम्मान बनाए रखने की असीम योग्यता है।

डॉ परम सदका अगर मेरे इलाके में मेरी संतानों को नई नौकरियां प्राप्त हो, उच्च शिक्षण संस्थानों में उनको ज्ञान प्राप्ति हो, मेरे इलाके में आर्थिक तरक्की के लिए नए आयाम स्थापित हों, समाजिक चेतना और बराबरी के नए मुकाम पर पहुंचने की क्षमताएं बढ़ाई जाएं तो जरूरी है कि हम डॉक्टर परम जैसे एक अच्छे नुमाइंदे  को आगे लाएं, पूर्व की भांति जिताए ताकि तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय यहां स्थापित हो सके और मेरी व मेरे इलाके की महिमा फिर संसार में दिन दुगुनी और चार चौगुनी रोशनी के साथ प्रज्वलित हो सके। जय संगरिया जय टिब्बी।

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